Monday, July 18, 2005

ख्‍वाबों का बज़ार

२५-०६-२००५

ख्‍वाबों का एक बज़ार लगा था ।
हर मुम्किन ख्वाब सजा था ।
हर एक ख्वाब मुफ्त ।।




हम ने बज़ार का दौरा किया ।
अखिर में हम पर यह नषर किया गया ।
कोई भी एक ख्वाब लेलो
और वह साकार होगा ।।



हम ने फिर बाज़ार का दौरा किया ।
हर एक ख्वाब पर फिर से नज़र दौडाई ।
हर एक ख्‍वाब को देखा जाना ।
अब तक इस पषोपेश में हैँ
कि किस ख्वाब को चुने ।।



ऐसे में ज़िन्दगी खत्म होने को आई ।

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Musafiroon ki gintee