Wednesday, August 03, 2005

खुदा पर शुबा क्‍यों

हुआ करे थी आसरा
जब खुदा की लौ ।
हर एक शख्‍स से
कुछ रिश्‍ता लगता था ।।



खुदा की ज़ात पर जो हुआ शुबा ।

आसमान से हट गई नज़र ।

अब हर एक कल

किसी खोफ का नाम है ।

किसी खोफ का पेगाम है ।

कभी तख्‍तो ताज ड़गमगाते हैं ।

कभी विरानों के सपने आते हैं ।।




पर शुबा हुआ क्‍यों

मुझे यह तो बता?


जब किया था खुदा पर एतबार

अपने ही होंसले पर क्‍यों शुबा हुआ ?



अगर बुत में बसता नहीं खुदा

जिस्‍म भी तो ख़ाक में मिलेगा ।

ख़ाक में तुँ उसे मिलेगा

या तुझको मिलेगा खुदा ।।



पर शुबा हुआ क्‍यों

मुझे यह तो बता?


एक एहसास है

जिससे ॑मैं ॑ बना ।

खुदा भी है

उस एहसास का जना ।।

या तो अपने एहसास पर कर एतबार

या फिर ये बेएतबारी छोड़ दे ।।



बुत में जो नहीं खुदा

खाक में तो भी मिलेगा तुँ ।

जो तेरी ख़ाक का बुत बना

क्‍या उस बुत में मिलेगा तुँ ?



______

मैं प्रतीक का धन्‍यवाद करता हुँ आप ने सही त्रुटी पहचानी । शब्‍द शुबा है शुभा नहीं जैसा मैने लिखा था । मैने त्रुटी सुधार ली है ।

5 comments:

  1. क्षमा चाहता हूं, पर मेरी उर्दू ज़रा कमज़ोर है। मैं यह जानना चाहता हूं कि 'शुभा' का क्‍या अर्थ है?

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  2. अरे यार! उर्दू हिन्दी डिक्शनरी है ना
    यहाँ देखो
    http://urdu2hindi.blogspot.com/

    अब ये डिक्शनरी सर्वज्ञ का हिस्सा बन गयी है, यानि कि आप भी इसमे अपने शब्द जोड़ सकते हो.

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  3. Pratik,

    It means "doubt" or Shaka.

    Here it has deeper connotation that means that when you become apprehensive about the very validity of the concept of God.

    You are from Agra. It is just a view that such a common word of Urdu should not be new to me. It may be that in Punjab there are more Persian and Urdu words which are in use but I think in Awadh and Mewati region, Urdu has panetrated to the same level. If Hindi is from 1050 origin then Urdu is from 1250 onwards. It is upto you that how much you use Sanskrit or Persian words. In Punjabi, there has been this conflict. In West Pakistan, they say that they speak Punjabi but speak more of Persian words. In Indian Punjab they use more of Sanskrit words and Baluchi language and call it PUnjabi by writing in Gurumukhi script. I am not master in linguistic but I understand that it is common word and not that difficult word.

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  4. I just wanted to add, that it was written when I was studying the effect of Darwin Theory on the Christian world. That has also effected my beliefs and faiths. After that I have kept on coming out and going back in my set of bliefs.

    Soon I will write another Post (call it my poetry) titled, Jamanay se Ranjish. That is also part of the same feeling.

    I will also write a small monologue titled Why did Social degradation set in India after eighth century. These are all by products of my understanding of own subject.

    Thanks for reading it.

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  5. Dear Sumir,

    The correct word is shubahaa (शुबहा). There is no word like shuba.

    I couldn't follow the word ईख्‍तेदाम, could you tell me its meaning.

    I respect your feelings, but wish to offer a suggestion. Please try to use the correct words in your poetry. It is not difficult. You can find some good Devanagari Urdu Hindi Dictionary in your nearby bookshop. You will be able to write still better poetry.

    I have revised one of your poems (with my very limited knowledge of Urdu)and its corrected version should be like this.

    इख़लाक़ और चाहत में जंग

    न पाल उन उमंगों को
    जो खेल ज़माना न माने
    ज़माना ग़लत ही सही बहुत
    खुदा की चाहत का पैमाना है

    क्‍यों चाहता है वो चाहतें
    जिन्‍हें पाने पर पाबन्‍दी हो
    इख़लाक़ और चाहत में जद्दोजहद
    पा लेने में
    और खो जाने में
    इक जंग हो

    वो कैसी मंज़िलें
    जिन्‍हें पाने पर
    छोड़ देने की चाहत हो
    जिन्‍हें पा लेने में
    कोई शक हो
    जिन्‍हें पा लेने पर
    कोई शुबहा हो

    जिस्‍मानी खू़बसूरती की तरफ़
    खींच तो हो
    पर चाहत की पाकीज़गी पर
    शक भी
    अगर वो नहीं
    तो वो तो है
    अगर वो नहीं
    तो शुबहा कैसा
    अगर ये नहीं
    तो शक कैसा

    उस अफ़साने को
    बीच में छोड़ जाना अच्‍छा
    जिसके ईख्‍तेदाम पर
    इक नई टीस उठे
    तेरे दिल की उमंगें
    नायाब हैं
    कोई सड़क की
    धूल नहीं
    इनमें सूरज की रश्मियों की
    पाकीज़गी है
    किसी शव में लगी
    आग नहीं



    चाहत तेरी गज़ब सी हसीन है
    हर एक गुल के लिए ये नहीं
    उठते फ़ाख्‍ता को भी मिलेगा आशियाना
    बाग़बान सभी अभी उजड़े नहीं

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Musafiroon ki gintee