Wednesday, July 27, 2005

हे राम

रात के गहन अन्‍धेरे में

घबराई हुई एक अबला

खुद में सिमटी हुई

इधर उधर देखे

ड़री ड़री सी

बे-तरन्‍नुम सांसे

सम्‍भालती हुई सी

शायद चाहती हो होंसला

हर एक कण से

क्‍या हर एक कण में

तुम हो हे राम

2 comments:

  1. जो अपनी पत्नी का साथ देने की हिम्मत न रख पाये
    वे कैसे बचायेंगे पराई औरत को!

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  2. Hi Anup,

    I never knew that my poetry was about extramartial relations.

    I thank you for apprising a new dimension of the poetry.

    sumir

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